Tuesday, April 16, 2019

12 साल से ग्रह का नाम नहीं रख पाए वैज्ञानिक, अब कहा- जनता तय करे

वॉशिंगटन. वैज्ञानिक एक ग्रह का नाम तय करने का मौका जनता को देना चाहते हैं। इसका कोडनेम ओआर10 है। अमूमन खगोलीय पिंड का पता लगाने वाले वैज्ञानिक ही उसका नाम तय करते हैं, लेकिन ओआर10 का नाम 12 साल बाद भी तय नहीं हो पाया है।

ओआर10 को रिसर्चर मेग श्वांब, माइक ब्राउन और डेविड रैबिनोवित्ज की टीम ने 2007 में अंतरिक्ष के एक किनारे पर स्थित कुइपर बेल्ट में ढूंढा था। इस बेल्ट में कई बड़े पदार्थ मौजूद हैं। ओआर10 उस मलबे में सबसे बड़ा ग्रह है जिसे नाम नहीं दिया जा सका।

तीन नामों का विकल्प

इसकी एक वजह यह है कि इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (अंतरराष्ट्रीय खगोल संघ) में नाम मंजूर कराने से पहले कुछ मापदंड पूरे करने जरूरी होते हैं। तीन वैज्ञानिकों के नाम पर ग्रह का नाम रखना संभव भी नहीं था। इसलिए तीनों खोजकर्ताओं ने संभावित नाम- गोंगगोंग, होले और विली नाम तय किए हैं। 

10 मई तक वोटिंग का समय

इन तीनों नामों की उत्पत्ति पौराणिक भगवानों के नाम पर आधारित है। रिसर्चर्स चाहते हैं कि अब यह जनता तय करे कि ग्रह का नाम क्या हो। इसके लिए वोटिंग रखी गई है। वोटर्स 10 मई तक वोटिंग कर सकते हैं। जिस नाम को सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे उसे ही ग्रह के नाम के लिए आईएयू के सामने प्रस्तावित किया जाएगा।

एक ग्रह का नाम तय करने का सौभाग्य दुनिया में बहुत ही कम लोगों को हासिल हुआ है। आमतौर पर यह मौका उन्हीं लोगों को मिलता है, जो ग्रहों की खोज करते हैं। कई बार तो ग्रहों और खगोलीय घटनाओं को आधिकारिक नाम तक नहीं दिया जाता और सालों तक वह अपने साइंटिफिक नाम से ही जाने जाते हैं। हालांकि, अब

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा सोमवार को दिए गए आदेश के बाद उठाया है। टिक टॉक के मालिकाना हक वाली कंपनी बाइट डांस ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने कंपनी पक्ष की गैरमौजूदगी में ऐप बैन करने का एकतरफा फैसला सुनाया है। इसे आधार बनाकर कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की याचिका दी थी, जो सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने टिकटॉक के डाउनलोड पर लगाई थी रोक

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने 3 अप्रैल को एक आदेश पारित कर सरकार को देश में टिकटॉक के डाउनलोड पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि टिकटॉक ऐप से पोर्नोग्राफी को बढ़ावा मिलता है। इसके बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया था। जहां रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने सोमवार को कहा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश सिर्फ अंतरिम आदेश है और मामला अभी विचाराधीन है। इस मामले पर मद्रास हाईकोर्ट 16 अप्रैल और सुप्रीम कोर्ट 22 अप्रैल को सुनवाई करेगा।

थर्ड पार्टी कंटेट की जिम्मेदारी हमारी नहीं- कंपनी
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, टिकटॉक ने आदेश को अपमानजनक, भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया है और बैन को लेकर कोई कमेंट नहीं किया है। टिकटॉक ने कहा कि उसे थर्ड पार्टी द्वारा अपलोड किए गए कंटेट के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है। कंपनी ने जुलाई 2018 से अब तक 60 लाख से ज्यादा ऐसे वीडियो अपने प्लेटफॉर्म से हटाए हैं, जो कंपनी की गाइडलाइन्स का पालन नहीं करते।

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